उत्तराखंड कांग्रेस का दोहरा चरित्र! अनुशासन के नाम पर कार्यकर्ताओं का शोषण, बड़े पदाधिकारियों को छूट !

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उत्तराखंड कांग्रेस सवालों में है। सवाल लाज़मी भी है और जायज़ भी। क्योंकि जहां एक तरफ सोशल मीडिया पर अपने दिल की बात कहने पर कार्यकर्ताओं को निष्कासन झेलना पड़ता है वहीं पार्टी के बड़े पदाधिकारी सोशल मीडिया पर कुछ भी कह लें ,, इसे उनका हक समझा जाता है।
बीते दिनों प्रदेश कांग्रेस से एक पुराने जुझारू कार्यकर्ता को सिर्फ उस बात के लिए बाहर का रास्ता दिखा दिया गया कि वो सोशल मीडिया पर बेहद एक्टिव होकर और बिना लाग लपेट के गलत को गलत कहने का साहस कर रहे थे। बड़े नेताओं को नागवार गुजरा। शिकायत प्रदेश आलाकमान के कानों तक पहुंची और बिना कारण जाने , बिना नोटिस दिए सीधे निष्कासन का फरमान सुना दिया गया।
अब ऐसा ही एक और वाक्या गुजरा है। पार्टी के बड़े पदाधिकारी सूर्यकांत धस्माना आपदा प्रबंधन को लेकर सरकार से सवाल पूछ रहे थे लेकिन इस दौरान उन्होंने अपनी ही पार्टी के पूर्व मुख्यमंत्री रहे हरीश रावत को भी सवालों के दायरे में ला खड़ा किया। उनसे सीधा सवाल उसी सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर पूछा गया । यहां न तो किसी बैठक में अपनी बात रखने का नियम आड़े आया , न नेताजी से मेल मुलाक़ात कर ऐसा कोई कायदा निभाया गया । 
अब कांग्रेस के कार्यकर्ता इस दोहरे मापदंड से सकते में हैं। उन्हें ये समझ नहीं आ रहा कि जिस सोशल मीडिया पर अपनी बात कहने भर से उन कार्यकर्ताओं को निष्कासित कर दिया जा रहा है जिनकी बात सुनने के लिए बैठकों का रिवाज है नहीं।  ऐसे में कार्यकर्ताओं को तो सोशल मीडिया ही नजर आती है। और वो पदाधिकारी जिनकी  बात  सुनने और समझने के लिए हाइकमान के पास पूरी फुर्सत है उन्हें भी सोशल मीडिया का सहारा लेना पड़ा।
 ऐसे में एक ही पार्टी में दो दो मापदंड कार्यकर्ताओं के गले उतर नहीं रहे हैं। अब ये तो अनुशासन समिति और पार्टी हाईकमान के ऊपर है कि वो इस मामले को भी उतनी ही संजीदगी से लेते हुए अपने पूर्व में दिए बयानों पर कायम रहते हैं जिनमें उन्होंने दोहराया था कि पार्टी का अनुशासन सबके लिए है। या फिर  उत्तराखंड कांग्रेस का यही तरीका है कि पदाधिकारियों पर करम करो और कार्यकर्ताओं पर सितम। 

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